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राजा महेन्द्र प्रताप सिंह

महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, समाज सुधारक एवं अद्वितीय दानवीर

राजा महेन्द्र प्रताप सिंह (1 दिसम्बर 1886 – 29 अप्रैल 1979) भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, पत्रकार, लेखक, समाज सुधारक तथा अद्वितीय दानवीर थे। वे "आर्यन पेशवा" के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारत की प्रथम निर्वासित अंतरिम सरकार का गठन किया तथा जीवनभर भारत की स्वतंत्रता, शिक्षा, सामाजिक समानता और विश्व बंधुत्व के लिए कार्य किया।


प्रारम्भिक जीवन

राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जन्म 1 दिसम्बर 1886 को उत्तर प्रदेश के मुरसान रियासत के जाट राजवंश में हुआ। वे राजा घनश्याम सिंह के तृतीय पुत्र थे। मात्र तीन वर्ष की आयु में उन्हें हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने गोद ले लिया, जिसके बाद वे हाथरस राज्य के उत्तराधिकारी बने।

उनका बचपन वृन्दावन स्थित राजमहल में बीता। उन्होंने अलीगढ़ के शिक्षण संस्थान में उच्च शिक्षा प्राप्त की। यद्यपि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वे स्नातक परीक्षा पूर्ण नहीं कर सके, फिर भी उनका ज्ञान, दूरदर्शिता और राष्ट्रप्रेम उन्हें महान व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करता है।


वैवाहिक जीवन

वर्ष 1902 में उनका विवाह जींद रियासत की राजकुमारी बलवीर कौर से हुआ। विवाह अत्यंत भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। उनके दो संताने हुईं—पुत्री भक्ति तथा पुत्र प्रेम। पारिवारिक जीवन के साथ-साथ उन्होंने राष्ट्रसेवा को सदैव सर्वोच्च स्थान दिया।


स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले आंदोलन से पूर्व ही राजा महेन्द्र प्रताप भारतीय स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो चुके थे। वर्ष 1906 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया और स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने विदेश जाकर जर्मनी, तुर्की, अफ़ग़ानिस्तान तथा अन्य देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। 1 दिसम्बर 1915 को काबुल में भारत की निर्वासित अंतरिम सरकार की स्थापना की, जिसमें वे स्वयं राष्ट्रपति बने तथा मौलाना बरकतुल्ला ख़ाँ प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। यह भारत की स्वतंत्रता के इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना थी।

उन्होंने रूस की यात्रा कर व्लादिमीर लेनिन से भी भेंट की तथा भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। वर्ष 1920 से 1946 तक वे विभिन्न देशों में रहकर भारत की आज़ादी के लिए कार्य करते रहे और अंततः 1946 में स्वदेश लौटे।


शिक्षा और समाज सेवा

राजा महेन्द्र प्रताप केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि महान शिक्षाविद और समाज सुधारक भी थे। वर्ष 1909 में उन्होंने वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की, जो भारत के प्रारम्भिक तकनीकी शिक्षण संस्थानों में से एक माना जाता है। इसके उद्घाटन समारोह में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित रहे।

उन्होंने अपने पाँच गाँव, वृन्दावन का राजमहल तथा अन्य विशाल संपत्ति इस शिक्षण संस्थान के लिए दान कर दी। वर्ष 1911 में उन्होंने लगभग 80 एकड़ का विशाल उद्यान भी आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान कर दिया, जहाँ बाद में गुरुकुल तथा राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान स्थापित हुए।


मानवता और सामाजिक विचार

राजा महेन्द्र प्रताप जाति, धर्म, वर्ग, रंग और देश के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरोधी थे। उनका विश्वास था कि सम्पूर्ण मानवता एक परिवार है। वे सामाजिक समानता, शिक्षा, भाईचारे और विश्व शांति के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने विश्व मैत्री संघ की स्थापना कर वैश्विक सद्भाव का संदेश दिया।


सार्वजनिक जीवन

स्वतंत्र भारत में भी उन्होंने राष्ट्रसेवा जारी रखी और संसद सदस्य के रूप में जनहित के कार्य किए। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रभक्ति, शिक्षा, सामाजिक सुधार और मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा।


सम्मान और विरासत

भारत सरकार ने उनके सम्मान में स्मारक डाक टिकट जारी किया। मार्च 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने अलीगढ़ में उनके नाम पर राजा महेन्द्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ उनके महान योगदान को सदैव स्मरण करती रहेंगी।


प्रेरणा

राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जीवन राष्ट्रप्रेम, त्याग, शिक्षा, मानवता और विश्व बंधुत्व का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपना वैभव, संपत्ति और जीवन राष्ट्रहित में समर्पित कर यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता सेवा, त्याग और कर्म में निहित होती है।

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