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महाराजा सूरजमल

जाट साम्राज्य के महान निर्माता एवं भरतपुर के यशस्वी महाराजा

शौर्य, नीति, दूरदर्शिता और राष्ट्र निर्माण के अद्वितीय प्रतीक।

परिचय

महाराजा सूरजमल (13 फ़रवरी 1707 – 25 दिसम्बर 1763) भरतपुर राज्य के महान शासक तथा जाट साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली राजाओं में से एक थे। उनके शासन का विस्तार वर्तमान दिल्ली, आगरा, अलीगढ़, एटा, फ़िरोज़ाबाद, भरतपुर, धौलपुर, गुरुग्राम, रोहतक, झज्जर, रेवाड़ी, मेवात तथा फरीदाबाद सहित उत्तर भारत के विशाल भूभाग तक फैला हुआ था।

वे वीरता, धैर्य, दूरदर्शिता, न्यायप्रियता, कूटनीति तथा उदार शासन के लिए प्रसिद्ध थे। समकालीन इतिहासकारों ने उन्हें "जाटों का प्लेटो" तथा आधुनिक इतिहासकारों ने उनकी बुद्धिमत्ता की तुलना ओडिसस से की है।


भरतपुर राज्य की स्थापना

भरतपुर क्षेत्र मूलतः सोघरिया जाट सरदार रुस्तम के अधिकार में था। सन् 1732 में बदन सिंह ने अपने युवा पुत्र सूरजमल को सोघर गाँव पर अधिकार करने भेजा। विजय प्राप्त करने के बाद वहीं एक नए नगर और दुर्ग के निर्माण की नींव रखी गई।

यही दुर्ग आगे चलकर लोहागढ़ किला कहलाया, जिसे भारत का एकमात्र ऐसा किला माना जाता है जो अनेक विदेशी आक्रमणों के बावजूद कभी पराजित नहीं हुआ। सन् 1753 में बदन सिंह और महाराजा सूरजमल भरतपुर में आकर बस गए।


राज्य संचालन एवं राजनीतिक कुशलता

बदन सिंह के वृद्ध होने के बाद राज्य की वास्तविक बागडोर महाराजा सूरजमल के हाथों में आ गई। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, बुद्धिमत्ता और राजनीतिक संतुलन बनाए रखा।

वे युद्ध को अंतिम विकल्प मानते थे तथा संघर्ष से पहले सदैव शांतिपूर्ण समाधान का प्रयास करते थे। यही नीति उन्हें अपने समय के अन्य शासकों से अलग बनाती है।


जाट शक्ति का उत्कर्ष

महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में जाट शक्ति उत्तर भारत की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में उभरकर सामने आई। उन्होंने आगरा की मुगल सेना को पराजित किया तथा अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया।

जयपुर के उत्तराधिकार युद्ध (1747–1748) में उन्होंने ईश्वरी सिंह का समर्थन किया और सात राजाओं की संयुक्त शक्ति के विरुद्ध विजय प्राप्त कर अपनी सैन्य क्षमता का परिचय दिया।

कुम्हेर के युद्ध (1754) में मराठों और मुगलों की संयुक्त सेना भी उनके किले को जीतने में असफल रही। अहमदशाह अब्दाली जैसे शक्तिशाली आक्रमणकारी भी उनकी शक्ति को समाप्त नहीं कर सके।


मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष

महाराजा सूरजमल ने जर्जर होती मुगल सत्ता के बीच एक सशक्त, स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी जाट शासन की स्थापना की। उनकी शक्ति के कारण मुगल साम्राज्य को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा।

इतिहासकार वेंदेल के अनुसार, उनके नेतृत्व में जाट शक्ति उत्तर भारत की प्रमुख शक्ति बन गई थी और मुगल साम्राज्य का घमंड पूरी तरह टूट चुका था।


मराठों से मतभेद

पानीपत के तृतीय युद्ध से पूर्व सदाशिवराव भाऊ और महाराजा सूरजमल के बीच कई रणनीतिक विषयों पर मतभेद उत्पन्न हुए।

सूरजमल ने धार्मिक स्थलों को नुकसान न पहुँचाने तथा लाल किले के दीवाने-खास की स्वर्ण छत को न तोड़ने की सलाह दी। उन्होंने सैनिकों के वेतन के लिए स्वयं आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा, किन्तु उनकी सलाह स्वीकार नहीं की गई।


मराठों के प्रति उदारता

14 जनवरी 1761 को पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय के बाद हजारों घायल एवं भूखे सैनिक भरतपुर पहुँचे। महाराजा सूरजमल ने बिना किसी भेदभाव के उनका स्वागत किया।

लगभग छह माह तक उनके भोजन, उपचार, वस्त्र तथा रहने की व्यवस्था कराई गई। महारानी किशोरी ने भी जनता से सहयोग लेकर राहत कार्य चलाए। विदा होते समय प्रत्येक सैनिक को भोजन, वस्त्र तथा आर्थिक सहायता प्रदान की गई।

यह घटना महाराजा सूरजमल की उदारता, मानवता और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।


अंतिम अभियान एवं वीरगति

मराठों के पतन के पश्चात उन्होंने गाजियाबाद, रोहतक, झज्जर तथा फर्रुखनगर जैसे अनेक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया और अपने राज्य का विस्तार किया।

25 दिसम्बर 1763 को दिल्ली के शाहदरा क्षेत्र में नवाब नजीबुद्दौला द्वारा धोखे से किए गए आक्रमण में महाराजा सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए।

उस समय उनके पास लगभग 25,000 पैदल सैनिक तथा 15,000 घुड़सवारों की विशाल सेना थी।


विरासत

महाराजा सूरजमल केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि न्यायप्रिय शासक, कुशल राजनीतिज्ञ, दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता और जनहितैषी राजा थे। उनका शासन साहस, संगठन, धार्मिक सहिष्णुता, सुशासन और राष्ट्रीय एकता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

भारतीय इतिहास में उनका नाम सदैव एक ऐसे सम्राट के रूप में स्मरण किया जाएगा जिसने जाट शक्ति को नई पहचान दी और भरतपुर को उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली रियासतों में स्थापित किया।

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